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हमें वीर केशव
हमें वीर केशव मिले आप जब से नई साधना की डगर मिल गई है । भटकते रहे ध्येय पथ के बिना हम न सोचा कभी दो क्या धर्म क्या है न जाना कभी पा मनुज तन जगत में हमारे लिए श्रेष्ठतम कर्म क्या है । दिया ज्ञान जबसे मगर आपने है निरन्तर प्रगति की डगर मिल गयी है ।।।। समाया हुआ घोरतम सर्वदिक था सुपथ है किधर कुछ नहीं सूझता था । सभी सुप्त थे घोरतम में अकेला ह्दय आपका हे तभी जूझता था जलाकर स्वयं को किया मार्ग जगमग हमें प्रेरणा की डगर मिल गयी है ।।।। बहुत थे दुखी हिन्दू निज देश में ही युगों से सदा घोर अपमान पाया द्रवित हो गए आप यह दृश्य देखा नहीं एक पल को कभी चैन पाया द्‌य की व्यथा संघ बन फूट निकली हमें संगठन की डगर मिल गयी है ।।।। करेंगे पुन: हम सुखी मातृभू को यही आपने शब्द मुख से कहे थे पुन: हिन्दू का हो सुयषगान जग में संजोए यही स्वप्न पथ पर बढ़े थे जला दीप ज्योतित किया मातृमंदिर हमें अर्चना की डगर मिल गयी है ।।।।
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