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क्या मुहम्मद के साथी लुटेरे थे -
 

 
 
क्या मुहम्मद के साथी इस समस्त दैवी योजना का सम्पूर्ण उद्देष्य मोहम्मद को पवित्र आत्माओं में से भी पवित्रमत के रूप में स्थापित करना था । यहतब तक सम्भव नहीं था जब तक युद्ध न लड़ा जाए । परन्तु लोग जब तक बड़े बड़े इनाम बदले में न मिलें, अपना जीवन जोखिम में नहीं डालते । इसका हल पवित्र जेहाद की संकल्पना है जिसे मोहम्मद ने अद्भुत चतुराई से गढ़ दिया । यह दावा किया जाता है कि जिहाद का वास्तविक उद्देश्य अच्छाई को स्थापित करना है और बुराई को रोकना है । ( सूरह अत तौबा 9ः25 और सूरह आले इमरान 3ः110, 111 संस्करण 2001 अनुवादकः मुहम्मद फारूक खाँ , प्रकाशक मकतबा अलहसनात ( दिल्ली ) 2241 - कूचा चेलान दरियागंज, दिल्ली ) परन्तु इतिहास कुरआन के इस विचार का समर्थन नहीं करता । निम्नलिखित घटना जिहाद की सच्ची प्रकृति और कामवासना के साथ इसके संबंध को दर्शाती है ( यह घटना सर विलियम म्यूर की पुस्तक ” लाइफ आफ मोहम्मद से ली गयी है ( पृश्ठ 418-422 ) यह पुस्तक 19 वीं शताब्दी में प्रकाशित हुई । फिर भी किसी ने इसमें वर्णित तथ्यों को झुठलाने का साहस नहीं किया ।
हुनैन के चुद्ध में जो कि एक फरवरी 630 ई. को हुआ था, लूट का निम्नलिखित सामान मिला -
” 24000 ऊँट, 40000 भेड़ें और बकरियाँ , 4000 औंस चांदी और 6000 कैदी । इन सबको नि कट की घाटी अल जिराना में ले जाया गया और ठहराया गया जहाँ पर अत तैफ से सेना की वापसी की प्रतीक्षा थी । “
अत तैफ के नागरिकों ने वीरता से सामना किया परन्तु मोहम्मद की सेना ने उनके प्रसिद्ध , अंगूरों के बगीचों को जो उनकी अर्थव्यवस्था का आधार थे , ध्वस्त करना षुरू कर दिया तो उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया । किन्तु समर्पण की प्रक्रिया में काफी समय लगा और उस समय अल्लाह के सिपाहियों को लूट का सामान बाँटने के प्रतीक्षा के लिए बहुत लम्बा लगा ।
कैदियों को उनके संबंधियों को सौंपना स्वीकार करके जैसे ही मोहम्मद अपने ऊँट पर सवार होकर अपने तम्बू की तरफ बढ़े तो उनके अनुयायियों को और अधिक प्रतीक्षा करना असह्य हो गया । वे लूट के माल का तुरंत बँटवारा चाहते थे और उनका रास्ता रोककर वे चिल्लाने लगे कि लूट के सामान ऊँटों और भेड़ों आदि का बंटवारा करो ।
भीड़ ने हल्ला बोलकर उनके साथ इतनी धक्का मुक्की की कि उन्हें एक पेड़ के नीचे शरण लेनी पड़ी और उनका चोगा फट उनके कंधों के नीचे गिर गया । मोहम्मद जो भारी धक्का मुक्की से बचकर कुछ अधिक मुक्त स्थिति में आ गए थे, चिल्लाए ” लोगों ! मेरा चोला मुझें वापिस करो और अल्लाह की कसम कि सब भेड़ों और ऊँटों को चाहे वे संख्या में इस जंगल के पेड़ों जितने हों, मैं उन सबको आप लोगों के मध्य बाँट दूंगा । तुमने अब तक मेंरे में कोई भी कोताही या झूठ नहीं पाया है “ ।
” इसके बाद अपने ऊँट के कोहान का ऐक बाल तोड़ा और उसको ऊँचा करके कहा कि ” लूट के माल में से मैं अपने पाँचवे भाग के अतिरिक्त अपने पास कुछ भी नहीं रखूंगा और उसके भी मैं आप लोगों में बाँट दूंगा । इस प्रकार वे सब शान्त हुए और मोहम्मद ने अपना रास्ता लिया ।
उपर्युक्त उदाहरण से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि मोहम्मद के अनुयायी अच्छाई स्थापित करने के लिए नहीं बल्कि लूट का माल हड़पने के लिए उनके साथ आक्रमणों मे सम्मिलित हुए, उन्होंने मोहम्मदके साथ जो दुर्व्यवहार किया उससे उनके लालच का पता चल जाता है ।
साभार - इस्लाम कामवासना और हिंसा पुस्तक पृष्ठ10
......वापिस
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