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लव जिहाद पर दारूल उलूम का स्पष्टीकरण – हिन्दुओं को मूर्ख बनाने का एक और प्रयास
 

 
 
आज भाजपा द्वारा यह कहे जाने पर कि मुसलमान लव जेहाद फैला रहे हैं दारूल उलूम द्वारा यह कहा गया है कि जेहाद का मतलब बुराइयों से लड़ना है । भाजपा द्वारा इस्लाम को बदनाम करने के लिए ऐसा कहा जा रहा है । पर उनके द्वारा यह नहीं बताया गया कि इस्लाम में सबसे बड़ी बुराई किस बात को माना है ।
            दारूल उलूम के धर्म गुरु भारत की भोली गैर मुसलमान जनता को मूर्ख बनाने के लिए ऐसे बयान जारी करते हैं । वे यह नहीं बताते कि इस्लाम के अनुसार दुनिया की सबसे बड़ी बुराई क्या है ।
            आइए हम यह जानने का प्रयास करते हैं कि इस्लाम में सबसे बड़ी बुराई किस बात को माना गया है इसके लिए इस्लामी वैबसाइट व पुस्तकों को ही आधार बनाया गया है । इसके लिए कृपया साइट http://vishvgaurav.blogspot.in/ का अध्ययन करें
            इस ब्लाग पर लिखा है कि
            पालनहार का साझी बनाना सबसे बड़ा गुनाह है
            उस सच्चे असली स्वामी ने अपनी किताब कुरआन में हमे बताया कि भलाइयां और सदकर्म छोटे भी होते हैं और बडे़ भी। इसी तरह उस स्वामी के यहाँ अपराध, पाप और बुरे काम भी छोटे बडे़ होते हैं। उसने हमें बताया है कि जो अपराध व पाप मनुष्य को सबसे अधिक और भयानक दण्ड का भोगी बनाता है, जिसे वह कभी क्षमा नहीं करेगा और जिसको करने वाला सदैव के लिए नरक में जलता रहेगा। वह नरक से बाहर नहीं जा सकेगा। वह मौत की इच्छा करेगा परन्तु उसे मौत कभी न आएगी।
            वह अपराध इस अकेले ईश्वर, पालनहार के साथ, उसके गुणों व अधिकारों में किसी को भागीदार बनाना है, इसके अलावा किसी दूसरे के आगे अपना सिर या माथा टेकना है और किसी और को पूजा योग्य मानना, मारने वाला, जीवित करने वाला, आजीविका देने वाला, लाभ व हानि का मालिक समझना बहुत बडा पाप और अत्यन्त ऊँचें दर्जे का जुल्म है, चाहे ऐसा किसी देवी देवता को माना जाए या सूरज चांद, सितारे या किसी पीर फ़क़ीर को, किसी को भी उस एक मात्रा स्वामी के गुणों में बराबर का या भागीदार समझना शिर्क (बहुदेववाद) है, जिसे वह स्वामी कभी क्षमा नहीं करेगा। इसके अलावा किसी भी गुनाह को यदि वह चाहे तो माफ़ कर देगा। इस पाप (अर्थात शिर्क) को स्वयं हमारी बुद्धि भी इतना ही बुरा समझती है और हमें भी इस काम को उतना ही अप्रिय समझते हैं।
            इस ब्लाग में जिस पुस्तक को लिखा गया है वह पुस्तक निम्न लिंक से भी प्राप्त की जा सकती है ।
            http://www.armughan.in/AKAAKSM/hindi.html
            इस प्रकार यह बात सिद्ध होती है कि इस्लाम में अल्लाह को न मानना दुनिया का सबसे बड़ा गुनाह है । अब दूसरा विषय यह है कि गैर मुसलमानों को दुनिया के इस सबसे बड़े गुनाह से बचाने के लिए एक मुसलमान को क्या करना चाहिए । उसके लिए हमें निम्न फतवे का अध्ययन करना चाहिए
            http://www.islamhouse.com/d/files/hi/ih_fatawa/hi_islam_qa/hi_islam_qa_10213.doc
            इस फतवे को १० भागों में बांटा गया है जिसके मुख्य भागों को यहां दिया जा रहा है
            "((((((सर्व प्रथम : इस्लामी आस्था के मूल सिद्धांतों में से, जिस का धर्म से होना आवश्यक रूप से सर्वज्ञात है और जिस पर मुसलमानों की सर्वसहमति है, यह है कि : धरती पर इस्लाम के सिवाय कोई दूसरा सच्चा धर्म नहीं पाया जाता है, और यह कि वह अन्तिम धर्म है और अपने से पूर्व सभी धर्मों, संप्रदायों और धर्म शास्त्रों को निरस्त करने वाला है, अत: पृथ्वी पर इस्लाम के सिवाय कोई धर्म बाक़ी नहीं है जिस के द्वारा अल्लाह की इबादत की जाये ।
            तीसरी : इस बात पर ईमान लाना अनिवार्य है कि तौरात और इंजील, क़ुरआन करीम के द्वारा मनसूख कर दिये गये हैं, और यह कि उन दोनों में कमी और वृद्धि के द्वारा परिवर्तन और हेर-फेर किया गया है, जैसा कि क़ुरआन करीम की कई आयतों में इस तथ्य को स्पष्ट किया गया है, उसी में से अल्लाह तआला का यह फरमान है : "उन लोगों के लिए हलाकत है, जो खुद अपने हाथों लिखी किताब को अल्लाह की किताब कहते हैं, और इस तरह दुनिया (धन) कमाते हैं, अपने हाथों लिखने की वजह से उन की बरबादी है, और अपनी इस कमाई की वजह से उन का विनाश है।" (सूरतुल बक़रा : 79)
            पाँचवीं : इस्लाम के मूल सिद्धांतों में से है कि यहूदियों, ईसाईयों और इन के अलावा अन्य लोगों में से जो भी व्यक्ति इस्लाम में प्रवेश नहीं किया है उस के कुफ्र का एतिक़ाद रखना और जिस पर हुज्जत क़ायम हो गई है उसे काफिर का नाम देना अनिवार्य है, और यह कि वह अल्लाह और उस के पैगंबर और मोमिनों का दुश्मन है, और वह नरकवासियों में से है, जैसा कि अल्लाह तआला का फरमान है :
            "अहले किताब (यहूदियों और ईसाईयों) के काफिर और मूर्तिपूजक लोग, जब तक कि उन के पास स्पष्ट निशानी न आ जाये रूकने वाले न थे।" (सूरतुल बैयिना : 1)
            तथा अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल ने फरमाया : "बेशक जो लोग किताब वालों (यहूदियों और ईसाईयों) में से काफिर हुये और मुशरिकीन सब नरक की आग में जायेंगे जहाँ वे हमेशा हमेशा रहेंगे, ये लोग बदतरीन मख्लूक़ हैं।" (सूरतुल बैयिना : 6)
            तथा अल्लाह तआला का फरमान है :
            "यह क़ुरआन सभी लोगों के लिए सूचना पत्र है कि इस के द्वारा वे सूचित (सावधान) कर दिये जायें।" (सूरत इब्राहीम : 52) इस के अलावा अन्य आयतें भी हैं।
            तथा सहीह मुस्लिम में साबित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "उस ज़ात की क़सम जिस के हाथ में मेरी जान है, इस उम्मत का जो भी आदमी चाहे यहूदी हो या ईसाई मेरे बारे में सुने, फिर भी उस शरीअत पर ईमान न लाए जो मैं देकर भेजा गया हूँ तो वह अवश्य नरकवासियों में से है।"
            इसीलिए जो आदमी यहूदियों और ईसाईयों को काफिर न समझे वह शरीअत के इस अधिनियम कि : "जो किसी काफिर को उस पर हुज्जत क़ायम हो जाने के बाद काफिर न कहे तो वह काफिर है।" के अन्तर्गत काफिर है।
            सातवीं : इस पापी निमंत्रण के कुप्रभावों और दुष्परिणामों में से इस्लाम और कुफ्र, हक़ और बातिल, अच्छाई और बुराई के बीच अन्तर को समाप्त कर देना और मुसलमानों और काफिरों के बीच घृणा के बंध को तोड़ देना है, फिर न तो (इस्लाम के लिए) दोस्ती और दुश्मनी बाक़ी रह जायेगी, और न धरती पर अल्लाह के कलिमा को सर्वोच्च करने के लिए युद्ध और जिहाद ही बाक़ी रह जायेगा, जबकि सर्वशक्तिमान और पवित्र अल्लाह का फरमान है कि "जो लोग अहले किताब (अर्थात यहूदियों और ईसाईयों) में से अल्लाह पर ईमान नहीं लाते और न आखिरत के दिन पर (विश्वास रखते हैं) और न उन चीज़ों को हराम समझते हैं जो अल्लाह और उसके पैग़म्बर ने हराम घोषित किये हैं, और न दीने-हक़ (सत्य-धर्म) को स्वीकारते हैं, उन से जंग करो यहाँ तक कि वे अपमानित हो कर अपने हाथ से जिज़्या (टैक्स) दें।" (सूरतुत्तौबा : 29)
            आठवीं : धर्मों की एकता के लिए निमंत्रण अगर कोई मुसलमान देता है तो इसे स्पष्ट रूप से इस्लाम धर्म से फिर जाना (मुर्तद हो जाना) समझा जायेगा ; क्योंकि यह इस्लामी आस्था के मूल सिद्धांतों से टकराता है, या निमंत्रण सर्वशक्तिमान अल्लाह के साथ कुफ्र को स्वीकारता है, और क़ुरआन की सच्चाई और उस के अपने से पूर्व सभी शरीअतों और धर्मों को मनसूख करने को असत्य (बातिल) कर देता है, इस आधार पर यह धार्मिक रूप से अस्वीकृत विचार है, और इस्लामी शरीअत के सभी प्रमाणों क़ुर्आन, सुन्नत और इज्माअ (मुसलमानों की सर्वसम्मति) के द्वारा निश्चित तौर पर हराम (निषिद्ध) है।
            नवीं : पिछली बातों के आधार पर :
            किसी मुसलमान के लिए एक ही परिसर में "मस्जिद, चर्च और मंदिर निर्माण" के निमंत्रण को स्वीकार करना जाइज़ नहीं है ; क्योंकि इस में इस बात की स्वीकृति पाई जाती है कि इस्लाम धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म के द्वारा अल्लाह की इबादत की जा सकती है, और सभी धर्मों पर उस की सर्वोप्परि का खण्डन पाया जाता है, तथा उस में इस बात का भौतिक निमंत्रण पाया जाता है कि धर्म तीन हैं और धरती वालों के लिए उन में से किसी एक को मानने का अधिकार है, और यह कि वे सभी बराबर हैं, और इस्लाम अपने से पूर्व धर्मों को निरस्त करने वाला नहीं है। इस बात में कोई शक नहीं कि इस का इक़रार करना और आस्था रखना या उस पर सहमत या प्रसन्न होना कुफ्र और पथ भ्रष्टता है ; क्योंकि यह क़ुरआन करीम, पवित्र सुन्नत और मुसलमानों की सर्वसम्मत का खुला विरोध है, और इस बात की स्वीकृति है कि यहूदियों और ईसाईयों की तहरीफात (परिवर्तन और कमी बेशी) अल्लाह की तरफ से हैं, अल्लाह तआला इस से बहुत सर्वोच्च और पवित्र है। इसी तरह गिरजा घरों (चर्च) को "अल्लाह के घर" का नाम देना और उस में रहने वालों को यह समझना कि वे उन में अल्लाह की सहीह इबादत करते हैं जो अल्लाह के पास मक़बूल है, जाइज़ नहीं है, क्योंकि यह इस्लाम धर्म के अलावा पर इबादत है, और अल्लाह तआला का फरमान है कि :
            "जो व्यक्ति इस्लाम के अतिरिक्त अन्य धर्म ढूंढ़े उसका धर्म कदापि स्वीकार नहीं किया जायेगा और वह आख़िरत (प्रलय) में घाटा (हानि) उठाने वालों में से होगा।" (सूरत आल इम्रान : 85)
            बल्कि ये ऐसे घर हैं जिन में अल्लाह के साथ कुफ्र किया जाता है, हम कुफ्र और उस के करने वालों से अल्लाह की पनाह में आते हैं। शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिया रहिमहुल्लाह मजमूउल फतावा (22/162) में फरमाते हैं कि : "गिरजा घर और पूजा स्थल (आराधनालय) अल्लाह के घर नहीं हैं, अल्लाह के घर केवल मस्जिदें हैं, बल्कि ये तो ऐसे घर हैं जिन में अल्लाह के साथ कुफ्र किया जाता है, भले ही उस में कभी कभी अल्लाह का ज़िक्र भी किया जात है, अत: घर उस के निवासियों के स्तर और पद से जाना जाता है, और उस के निवासी काफिर लोग हैं, इसलिए यह काफिरों की इबादत के घर हैं।"
            दसवीं : यह बात जान लेना अनिवार्य है कि : सामान्य रूप से काफिरों, और विशेष रूप से अहले किताब (यहूदियों और ईसाईयों) को इस्लाम की तरफ निमंत्रण देना, क़ुरआन और हदीस के स्पष्ट प्रमाणों के द्वारा अनिवार्य है, लेकिन यह केवल वक्तव्य और अच्छे ढंग से बहस के द्वारा और इस्लामी शरीअत की किसी चीज़ से समझौता किये बिना ही होना चाहिए, और इस का मक़सद उन्हें इस्लाम से सन्तुष्ट करना और उस में प्रवेश कराना है, या उन पर हुज्जत स्थापित करना है ताकि जो तबाह हो वह समझ बूझ के साथ तबाह व बरबाद हो और जो जीवित रहे वह दलील के आधार पर ज़िन्दा रहे, अल्लाह तआला का फरमान है :
            "आप कह दीजिये कि ऐ किताब वाले (यहूदी और ईसाई) ऐसी इन्साफ वाली बात की ओर आओ जो हम में तुम में बराबर है कि हम अल्लाह तआला के सिवाय किसी की पूजा न करें न उस के साथ किसी को साझी बनायें, न अल्लाह तआला को छोड़ कर आपस में एक दूसरे को ही रब बनायें, फिर अगर वह मुँह फेर लें तो तुम कह दो कि गवाह रहो हम तो मुसलमान हैं।" (सूरत आल इमरान : 64)
            लेकिन जहाँ तक उन की इच्छाओं पर उतरने और उन के उद्देश्यों को पूरा करने और इस्लाम की कड़ियों को तोड़ने और विश्वास के स्तंभों को ध्वस्त करने के लिए उन से बहस करने, उन के साथ मिल बैठने (भेंट करने) और उन से बात चीत करने का संबंध है तो यह बातिल है, अल्लाह, उस के पैगंबर और मोमिन लोग इस को नकारते और नापसन्द करते हैं, और जो कुछ बातें ये बनातें हैं उस पर अल्लाह तआला ही से मदद मांगते हैं। अल्लाह तआला का फरमान है :
            "और आप उन से होशियार रहिए कि कहीं ये लोग आप को अल्लाह के उतारे हुए किसी हुक्म से इधर उधर न कर दें।" (सूरतुल मायदा : 49)समिति उपर्युक्त बातों को सुनिश्चित करते हुये और उसे लोगों के लिए स्पष्ट करते हुए ; मुसलमानों को सामान्य रूप से, और विद्वानों को विशेष रूप से अल्लाह तआला से डरने और उस के आत्म निग्रह, इस्लाम के समर्थन, और मुसलमानों के अक़ीदा को गुमराही और उस की ओर बुलाने वालों, कुफ्र और काफिरों से सुरक्षित रखने की वसीयत करती है, और उन्हें इस विचारधारा से सावधन करती है। )))))
            इस प्रकार फतवे का सांराश निम्न प्रकार से है
            हुज्जत (गैर मुसलमान को मुसलमान द्वारा इस्लाम कबूल करने का निमंत्रण देना ) कायम हो जाने के बाद यदि गैर मुसलमान इस्लाम स्वीकार न करे तो उसे का‍फिर नाम देना एवं गैर मुसलमानो से तब तक जंग करना जब तक वे इस्लाम स्वीकार न करें अथवा जजिया टैक्स देना स्वीकार न कर लें, अनिवार्य है । इस्लाम में मुसलमान का गैर मुसलमान से नफरत करना , उसे इस्लाम स्वीकार करने के लिए कहना और इस्लाम को पूरी दुनिया में फैलाने के लिए जिहाद का करना आवश्यक बताया है । सारे धर्मों का सार एक मानने एव दूसरे धर्म का सम्मान करने को इस्लाम में एक अपराध बताया गया है । इसी कारण सारी दुनिया के कटटर मुसलमान गैर मुसलमान दुनिया के विरुद्ध जेहाद में लगे हुए हैं ।
            इस प्रकार यह पुस्तक व फतवा व पुस्तक सिद्ध करती है कि इस्लाम एक असहिष्णु व साम्प्रदायिक मजहब है ।
            वर्तमान में इन जिहादी मुसलमानों की समस्या यह है कि उनकी ताकत विश्व में इतनी नहीं है कि विश्व के ताकतवर गैर मुसलमान देशों जैसे भारत , अमेरिका, रूस , फ्रांस , इंग्लैण्ड , इस्राइल इत्यादि से सीधे युद्ध कर सकें । इस कारण इन्हें पूरे विश्व में जेहाद के दूसरे रूप अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है । उनमें से एक है कि अपनी जनसंख्या को इतना बढ़ाया जाए कि गैर मुसलमान देश पर काबिज हो सकें । इसी कारण भारत जैसे देशों में अपनी जनसंख्या बढ़ाने के लिए लव जिहाद का सहारा लिया जा रहा है ।
            यह देश के समझदार धर्मनिरपेक्ष मुसलमानों के लिए चुनौती है कि उपरोक्त फतवों व पुस्तकों में लिखी बातों का स्पष्टीकरण दें, उसे गलत कहें अन्यथा उसके अभाव में देश के गैर मुलसमानों को इन फतवों , पुस्तकों व लव जेहाद की बढ़ती घटनाओं के के परिप्रेक्ष्य में इस इस बात को स्वीकार करना होगा कि मुसलमान पूरे विश्व को मुसलमान बनाने के लिए जेहाद का सहारा ले रहे हैं जिसका एक रूप लव जेहाद है ।
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