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समुत्कर्ष प्राप्ति की राजविद्या
 

 



                    सन्‌ १७५७ में अंग्रेज प्लासी की लड़ाई में विजयी हुए और उसी समय इस भारत भूमि में उनके पैर जम गये। अगले सौ वर्षों में उन्होनें सम्पूर्ण भारत को पदाक्रान्त कर डाला। अपने साम्राज्य की स्थापना के लिए अंग्रेज ने यहां पर इन सौ डेढ़ सौ वर्षों में कैसे कैसे घोर कृत्य किये इसकी जानकारी इतिहास के सामान्य वाचक को भी है। उन्होंने झूठे दस्तावेज बनाये, स्त्रियों पर अत्याचार किये धन लूटा अन्याय से सम्पत्ति का अपहरण किया राज्य हड़प लिये और अनेकानेक निरपराध मनुष्यों को मौत के घाट उतारा हत्याएं की। ऐसा एक भी पाप न था जो अंग्रेजों ने न किया हो। फिर भी सन्‌ १६०० ई० में ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना के पश्चात लगातार उनका उत्कर्ष होता गया। केवल हिन्दुस्थान में ही नहीं अपितु अफ्रीका कनेडा अरगस्तान चीन इत्यादि देशों में उनका प्रभुत्व प्रस्थापित हुआ कभी सूर्योस्त न देखने वाले साम्राज्य का वे निर्माण कर सके। उपर्युक्त प्रत्येक देश में उन्होंने भीषण कुकृत्य किये। अफ्रीका और अमरीका में तो उन्होंने अनेक मानव जातियों के वंशों का समूलोच्छेद करने का प्रयास किया। जहां पर ऐसा करना संभव न हो सका वहां उन्होंने शराब, अफीम आदि हानिकर व्यसनों को फैलाया तथा रोग के कीटाणुओं का भी संचार करने से न चूके। अटिल्ला और चंगेज के समान उन्होंने प्रत्यक्ष नरमेध भले ही न किये हों परन्तु ऊपर दी हुई पद्धतियों का अवलम्बन कर उन्होंने उनसे भी कही अधिक नर संहार किया है। तथापि वे सदा ही विजयी हुए। धन सम्पन्नता वैभव समृद्धि श्री विजय भूति आदि का सतत उन्हें लाभ ही होता गया। कला विज्ञान साहित्य तथा दर्शन के क्षेत्र में भी उनकी प्रगति होती रही। बढ़ाया हुआ पग पीछे हटाने का प्रसंग उन पर कभी नहीं आया।
 
हिन्दुस्थान पर पाश्चात्यों का आक्रमण सोलहवीं शताब्दी में प्रारम्भ हुआ। सर्वप्रथम पुर्तगाली आये फिर फ्रान्सीसी और डच तथा सबसे अन्त में अंग्रेज आये। इनमें से प्रत्येक आक्रान्ता के समक्ष हम दुर्बल सिद्ध हुए मुंहकी खानी पड़ी। उनके आपसी संघर्ष के कारण ही उनमें से कई असफल हुए हमें उसका यत्किंचित भी श्रेय प्राप्त नहीं है। जिसके साथ भी हम छुटकारा पा सके है। इन आक्रान्ताओ में से प्रत्येक के कारनामें अंग्रेजों के समान ही कालिमा और नीचता से परिपूर्ण थे। सभी ने लूट आगजनी अत्याचार बलात्कार और नर मेध का सहारा लिया। पाप पुण्य उचित अनुचित आदि विधि निषेधों को उन्होंने ताक में रख दिया। केवल दानवीय वृत्ति के द्वारा ही उन्होंने राज्य जीते और उन्हें टिकाए रखा। सत्य न्याय अहिंसा नीति धर्म आदि से उनका लवमात्र भी सम्बन्ध न था तो भी वे विजयी हुए तथा उनका उत्कर्ष ही हुआ।
इस अवधि मे भारतीयों ने क्या कोई विशेष पाप किये थे। भारत के लगभग प्रत्येक प्रान्त में इस कालखण्ड में अनेक धर्म सम्प्रदाय उदित हुए। इन सम्प्रदायों के सन्तों ने भागवत प्रणीत भक्ति मार्ग का प्रचार व प्रसार का कार्य चारों ओर सम्पूर्ण वेग से चला रखा था। भजन पूजन कीर्तन नामस्मरण आदि का वे उपदेश करते। सत्य न्याय परोपकार नीति वैराग्य आदि धर्म के मूल तत्वों को जनमानस पर अंकित कर रहे थे। यह उदात्त धर्मोपदेश जनसाधारण तक पहुंच चुका था। इतना ही नहीं संत परम्परा की यह विशेषता थी कि उसके अन्तर्गत धर्मोपदेशकों में से अधिकांश लोग छोटी जातियों में से थे। इन धर्मधुरीणों के लाखों अनुयायी थे। अतः घर घर भगवान नाम का संकीर्तन चालू था। धन लोभ नहीं करना चाहिए पर स्त्री की ओर दृष्टि नहीं डालनी चाहिए दास दासी पशु पक्षी आदि सभी पर पुत्रवत्‌ स्नेह करना चाहिए सत्याचरण करना चाहिए अहिंसा धर्म का पालन करना चाहिए इत्यादि नीति वाक्य वे दिन रात सुना करते थे। इस कारण इस देश का जनसाधारण सरल श्रद्धायुक्त पापभीरु प्रवृत्ति का बन गया था। परन्तु इस कारण से भारत पर आने वाली विपदाएं टली नहीं। स्वतन्त्रता व धन दोनों ही छिन गये। अनेक स्थानों पर स्त्रियों का भी अपहरण हुआ और जनता को दरिद्रता तथा यातनाओं के नरक में सड़ना पड़ा।
अंग्रेज फ्रांसीसी पुर्तगाली ये सभी पापाचरणी थे अधर्माचारी थे नीति भ्रष्ट हो चुके थे। हमने पुण्य साधन किया धर्म मार्ग का अनुगमन किया नीतिनिष्ठ बने तो भी ऐश्वर्य विजय श्री भूमि विद्या कला स्वतंत्रता तथा साम्राज्य का लाभ उन्हें हुआ और दरिद्रता दुःख अज्ञान परतन्त्रता दास्य ये सब हमारे हिस्से में आये।
ऊपरी तौर से देखने पर ऐसा ही चित्र हमारे सम्मुख आता है - इसमें जरा भी सन्देह नहीं। परन्तु ऊपर से सत्य प्रतीत होने वाला यह दृष्य क्या वास्तव में सत्य है सचमुच ही क्या अंग्रेजों के हिसाब में किसी भी प्रकार का पुण्य जमा नहीं है क्या उन्होंने न्याय नीति और मनुष्यता को पूरी तरह बहिष्कृत कर रखा था यदि बारीकी से उनके देश के इतिहास का अध्ययन करें तो हमे अपने विचारों में कुछ परिवर्तन करना होगा। हिन्दुस्थान में साम्राज्य प्राप्ति के लिए उन्होंने नृषंप पाप किये पूरी तरह अधर्म का आश्रय लिया तथापित वे एक दूसरे धर्म विशेष के सहारे खड़ें थे। उसका उन्होंने दृढ सहारा लिया था निष्ठा के साथ उन धर्म तत्वों का वे पालन करते थे जितनी निष्ठा से हम भागवत्‌ धर्म के पालन में लीन थे।
दो तीन सौ साल की इस दीर्घावधि में एक भी अंग्रेज ने अपने देश के प्रति बेईमानी नहीं की। पृथ्वी तल के किसी भी भू भाग में रहने वाले अंग्रेज की दृष्टि सदैव अपनी मातृभूमि पर लगी रहती थी यही उनका धर्म था जिसने स्वजातिबन्धु अथवा स्वदेश से द्रोह कर इस धर्म का परित्याग किया हो। अंग्रेज अनेक देश देषान्तर के निवासियों के सम्पर्क में आये अनेक धर्म सम्प्रदाय व जाति के लोगों से उन्हें व्यवहार करना पड़ा अपनी मातृभूमि से हजारों मील दूर वे भटके उन्होंने अनेकानेक प्रकार का वैभव सौन्दर्य और विलास देखा परन्तु इन चीजों के मोहासक्ति में फंसकर कोई भी अंग्रेज दूसरे अंग्रेज के विरुद्ध लड़ा नहीं। उन्होंने अपनी मातृभूमि इंग्लैण्ड के विरुद्ध गद्दारी नहीं की। भारत के सुल्तानों की सफल चिकित्सा के कारण जब उन्हें पारितोषिक प्राप्त हुए तब भी उनके सम्मुख उनके देश के उत्कर्ष का विचार ही प्रधान था। व्यक्तिगत स्वार्थ उनके विचारों को छू न सका। क्लाइव वारेनहैस्टिंग्ज के आधिपत्य में इतनी बड़ी तथा शक्तिशाली सेना थी इतनी अधिक राजनीतिक शक्ति थी कि वे चाहते तो इंग्लैण्ड से हजारों मील दूर इस भारत में अपना स्वतन्त्र राज सहज स्थापित कर सकते थे। मुसलमानों के राज्यकाल में ये रोज की घटनाएं थी। सन्‌ १३४६ में महाराष्टृ के मुसलमान सरदारों ने दिल्ली की केन्द्रीय सत्ता को उतार फेंका और स्वतंत्र बहमनी राज्य की स्थापना की। पश्चात वह राज्य पांच टुकड़ों में बंट गया। इसके बाद के कालखण्ड में दक्षिण के निजाम बंगाल के सूबेदार और अवध के नवाबों ने भी इसी नीति को अपनाया। मराठा शासन के उत्तरार्द्ध में यही प्रवृत्ति विद्यमान थी। यक्तिंचित शक्ति प्राप्त होते ही नये राज्य की स्थापना करने की प्रवृत्ति ही सर्वत्र दिखाई देती है।इन सरदारों की अपेक्षा हजार गुनी शक्ति अंग्रेज सरदारों के पास थी साथ ही वे अपनी केन्द्रीय सत्ता से हजार मील दूर थे परन्तु स्वतंत्र राज्य की स्थापना का विचार स्वप्न में भी उनके मन में नही आया। क्या यह धर्माचरण नहीं है क्या वह पुण्य कार्य नहीं है क्या इसमें मनोनिग्रह संयम स्वार्थ त्याग ये गुण विद्यमान नही है निश्चित रुप से है। इन गुणों के अभाव में उत्कर्ष असम्भव हैं सत्य अद्रोह निष्ठा इनके बिना किसी भी समाज का उत्कर्ष नहीं हुआ करता। मनुष्य के उत्कर्ष व पराक्रम के लिए धर्म अनिवार्य है। महाभारत काल के अनुसार तो डाकुओं को भी सत्य धर्म का आश्रय लेना पड़ता है। उसके बिना वे यषस्वी नहीं हो सकते।
अपि पापकृतों रौद्राः सत्यं कृत्वा पृथक पृथक।
अद्रो हं अविसंवादं प्रवर्तते तदाश्रयाः॥
उन्हें अपने गिरोह की सीमा तक उस सत्य का पालन करना पड़ता है। लूट में प्राप्त माल का बंटवारा यदि न्यायपूर्ण नहीं हुआ तो उनके गिरोह में फूट घर कर लेगी व उनका सर्वनाश होगा। उनमें से यदि कोई एक भी मुखबिर भेदिया बन गया तो भी परिणाम यहीं होगा। यदि सब सहमत न हो सके फूट पड़ गयी संघभाव मिट गया तो भी वही हालत होगी। यदि व्यक्तिगत स्वार्थ प्रबल हो गया वे परस्पर असत्याचरण करने लगे तो अल्पावधि में ही वे सब पकड़े जायेंगे इसलिए डाकुओं को भी सत्य के सहारे ही रहना पड़ता है। परन्तु सत्य पालन की यह शर्त उनके अपने सदस्यों तक ही सीमित है। जो भी सौ पचास व्यक्ति दल के सदस्य होंगें उन्हें तक यह सत्याचरण व धर्म मर्यादित है। उस सीमा के बाहर वे नीति नियमों का पालन नहीं करते। सब प्रकार के पाप और कपट करते है। फिर भी वे उन पापों के परिणामों से मुक्त रहते है। यदि सभी को पराभूत करने वाला कोई दूसरा सम्मुख अड़ जावे तो ही वे पराभूत होंगे। परन्तु अन्यों के साथ किये हुए पापाचरण व असत्य व्यवहार के कारण ये पराभूत होंगे तथा सबल दल सत्य और धर्म का पालन करने के कारण विजयी होगा ऐसा नहीं। ये दोनों दल स्वकीयों के साथ सत्य नीति का पालन कितना करतें है इस बात पर ही उनका जयापजयी होना निर्भर है। परकीयों के साथ वह कैसा व्यवहार करते है इस पर नहीं।
डाकुओं का गिरोह यह एक छोटा समुदाय है। परन्तु उससे भी आगे बढ़कर बड़े समुदायों का विचार करें और सबसे बड़े संघटन राष्टृ इस समष्टि का भी विचार करें तो ऐसा दिखाई देगा कि उसमें भी स्वकीयों के साथ व्यवहार में सत्य एकनिष्ठा अविसंवादित्व अद्रोह और त्याग इन धर्म तत्वों की उत्कर्ष हेतु उतनी ही आवष्यकता है। और यह निर्विवाद सत्य है कि वि्श्व विजय की कामना से निकले हुए अंग्रेजों ने इस धर्म का पूरी लगन से पालन किया। अंग्रेजों का यह धर्म संघ अथवा समाज धर्म है। प्रारम्भ में जिस सत्य धर्म का पुण्याचारण का विचार हम कर रहे थे वह यह धर्म नही है। वह धर्म व्यक्तिगत स्वरुप का है। अपने धर्मग्रन्थों में विशेषकर संत साहित्य में इसी व्यक्ति धर्म का उपदेश है। गरीबों को दान देना चाहिए सत्य बोलना चाहिए हिंसा नहीं करनी चाहिए धर्मशालाएं बनवानी चाहिए कुएं खुदवाने चाहिए घाटों का निर्माण करवाना चाहिए सदावर्त चलाना चाहिए परस्त्री पर कुदृष्टि नहीं डालनी चाहिए पतिव्रत्य का पालन करना चाहिए आदि आदि प्रकार की आज्ञाएं धर्म ने की है। कुलधर्म जातिधर्म व वर्णधर्म का भी निरुपण अपने धर्म में मिलेगा। परन्तु उसमें संघ धर्म की दृष्टि नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने अपने वर्णनुसार आचरण विवाह अंत्येष्टि भजन पूजन करना चाहिए इतना ही नहीं उन उपदेशों का अर्थ है। क्षत्रिय क्षत्रिय के अथवा वैश्य वैश्य के प्रति द्रोह न करें ऐसा उपदेश उसमें नहीं है। छोटी जातीय संकुचित दृष्टि से भी इस धर्म का उपदेश गत सहस्त्र वर्षों में भी किसी ने नहीं किया। यहां संकीर्ण जातीय प्रवृत्ति अवश्य ही थी। परन्तु समष्टि हित की संघ दृष्टि नहीं थी। पूरी कुम्हार जाति की अवनति होने लगी मालियों का पतन होने लगा तो क्या करना चाहिए इस जाति का बल संघधर्म किस तरह करना चाहिए इन बातों का विचार यहां किसी की बुद्धि में न आया। सम्पूर्ण समाज का विचार तो लवमात्र भी न किया गया। नागरिकों के व्यक्तिगत पापों के कारण ही समाज का पतन होता है। और पुण्याचरण में समाज उत्कर्ष को प्राप्त होता है। ऐसी तत्कालीन श्रद्धा थी।
मेरी राय में भारत का पतन का यही प्रमुख कारण है। संघधर्म संघविधा यह ऐश्वर्य प्राप्ति की राजविद्या है। उस संघधर्म की शास्त्रशुद्ध उपासना गत हजारो वर्षों में तात्विक पद्धति से तो किसी ने की ही नहीं परन्तु व्यवहार में भी उसका विचार कभी नहीं गया। जीवन धारणा के लिए मनुष्य को समाज बनाकर रहना पड़ता है। परन्तु उस समाज का उत्कर्ष निष्ठा विशेष के बिना नहीं हो सकता। ऐसी निष्ठा की अनन्य साधना गत सहस्त्र वर्षों मे भारतवासियों ने नहीं की। एक ही स्वामी के सेवक परस्पर संघर्ष नहीं करेंगे एक दूसरे के विरुद्ध द्रोह नहीं करेंगे इस प्रकार की निष्ठा का सदा व सर्वत्र अभाव ही रहा। हिन्दू सिख मुसलमान आपस में झग़ड़ा नहीं करेंगे इस प्रकार बन्धन कभी न था। मराठा मराठा से राजपूज राजपूत से कन्नड़ कन्नड़ से वैर नहीं करेंगा ऐसा तत्व भी यहां प्रस्थापित न हो सका। संघधर्म अथवा संघ विद्या जिसे कहना चाहिए वह यही है। भारत में आये हुए पाश्चात्य आक्रामक इस संघविद्या के अनन्य उपासक थे। भारतीयों के साथ व्यवहार में अन्याय असत्य धर्मभ्रष्टता का उन्होंने अवलम्बन किया परन्तु अपनी समष्टि की सीमा में वे सत्य न्याय स्वार्थत्याग आदि धर्मतत्वों का कट्टरता से पालन करते थे। उन्हें विजयश्री समुत्कर्ष और ऐश्वर्य की सदा ही प्राप्ति होती रही इसके पीछे ही रहस्य की बात यदि कुछ है तो वह इस संघधर्म की अनन्य आराधना है। हमे प्रत्येक आक्रामक के हाथों पराभूत होना पड़ा इसके ........................................
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