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भारतीय इतिहास के छ स्वर्णिम पृष्ठ वीर सावरकर
 

 



                    अन्य महान्‌ राष्ट्रों की भाँति भारत पर भी ऐतिहासिक काल में मुख्यतः यवन,शक ,हूण इत्यादि विधर्मी म्लेच्छों द्वारा जो बड़े -बड़े भयंकर सशस्त्र आक्रमण हुए और जिनसे भारत को अनेक शताब्दियों तक जूझना पड़ा ,अंततः हिन्दुस्थान ने उन सबका पराभव कर उनकी राजसत्ता का समूल उच्छेद किया और अपनी राजकीय स्वतंत्रता बार-बार प्रस्थापित की। पुनश्च ,संघर्षकाल में जो यवन,शक ,हूण आदि लाखों म्लेच्छगण अनेक प्रान्तों मे स्थायी रूप से बस गये थे, उन्हें अपने वैदिक धर्म, देवी-देवताओं संस्कृत भाच्चा और सभ्यता -संस्कृति की दीक्षा देकर समाज में खपा लिया था कि उनके मूल म्लेच्छ गोत्र ,नाम आदि पूर्णतः समाप्त हो गए और वे स्वेच्छा से हिन्दूजाति में पूर्णरूप से मिलकर ऐकरस और एकजीव हो गये।
 
परन्तु मुस्लिम आक्रमण का संकट जब हिन्दुस्थान पर आया तब हिन्दू राष्ट्र प्रतिकार करने के लिए उससे एक हजार वर्ष तक जूझता रहा। अंत में यद्यपि हिन्दुओं ने मुस्लिम राजसत्ता को यवन-षक-हूणादि की परकीय सत्ताओ के समान ही उखाड़ डाला और अपनी राजकीय स्वतंत्रता पुनः प्रस्थापित कर ली ,तथापि उन्होनें जिस प्रकार यवन शकादि को पचाकर पूर्णरूप से हिन्दू बना लिया,उस प्रकार वे मुसलमानों का हिन्दूकरण क्यों नहीं कर सके?
इस ग्रंन्थ के आरम्भ में प्रस्तुत उक्त प्रश्न का सूक्ष्म विश्लेषण इस दूसरे भाग में मुख्यतः ऐतिहासिक आधार पर किया गया है। उस समय की परिस्थिति का इस विश्लेषण से यही निष्कर्ष निकलता है कि मुस्लिम राज्य-सत्ता का उच्छेदन करते समय तथा इसके तुरन्त पश्चात्‌ जो अनेक अनुकूल अवसर मिले उनका उपयोग कर हिन्दुओं ने मुस्लिम धर्मसत्ता पर अत्याचारी प्रत्याक्रमण नही किया और शक्तिप्रयोग करके मुसलमानों को हिन्दू नही बनाया।
पहले जिस प्रकार यवन,शक ,हूण आदि के मामलों में उनके द्वारा हिन्दू धर्म में आने की बात सोचते ही,उस समय के हिन्दू-जगत्‌ ने सहभोजन,सहनिवास ,सहविवास आदि सामाजिक जीवन के समस्त उपांगो में पात्रापात्र विवेकपूर्ण उन्हें अपने समाज में मिला लिया। उसी प्रकार मुस्लिम राज्यसत्ता का पराभव करने के उपरान्त यदि उस समय के विजयी हिन्दू -जगत्‌ ने रोटीबन्दी ,बेटीबन्दी, शुद्धिबन्दी सिन्धुबन्दी इत्यादि सामाजिक रूढ़ियो को तोड़कर एक तरफ से सब मुसलमानों को शुद्ध कर पात्रापात्र विवेकपूर्वक अपनी परम्परा में आत्मसात्‌ कर लिया होता तो यह हिन्दुस्थान उसी समय स्पेन आदि देशों के समान ही मुस्लिम-विहीन हो गया होता और यह सही अर्थ में'हिन्दुओं का स्थान बन जाता'।
इस ग्रन्थ में साधारण सन्‌ ७०० ई से १८०० तक के कालखण्ड में हिन्दुस्थान पर हुए मुसलमानों के आक्रमण और उनके कारण सतत्‌ जारी रहे हिन्दू-मुस्लिम महायुद्ध कें इतिहास की समीक्षा के सभी तथ्यों का सम्बन्ध उस कालखण्ड की ही परिस्थिति से है इन्हें पढ़तें समय पाठको को हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि उन ऐतिहासिक परिस्थियों में देश -काल- पात्र की संगति में जॊ कार्य आवश्यक इष्ट अथवा हितकारी सि होते है वे अन्य परिस्थितियो तथा कालखण्डो में भी सम्भव है कि देशकाल पात्र के भेद से वे अनावश्यक अनिष्ट और अहितकारी सिद्ध हो । फिर यह समस्या चाहे राजनीति धर्मनीति अथवा जीवन के किसी अन्य सम्बन्ध रखती हो ।
राजनीति और धर्मनीति के मान्य आचार्य समर्थ रामदास स्वामी ने अपने निम्नांकित छन्द में यह रहस्य स्पष्ट रीति से व्यक्त किया है
समयासारखा समयो ये ना । नेम एकचि चालेना ।।
नेम धरिता राजकारणा। व्यत्ययो पडे ।।
अर्थात् समय सरीखा समय न होवे एक नियम न चले ।
राजनीति में नियम रखे तो व्यतिक्रम बहुत पडे ।।
……………………………………और
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