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इस्लाम में महिलाओं की स्थिति -
 
इस्लाम में महिलाओं या किसी भी विषय पर क्या सही है अथवा क्या नहीं इसके लिए नैतिकता या अपनी बुद्धि का प्रयोग करने की अनुमति नहीं है । इस्लाम में नैतिकता से धर्म ग्रंथों का विवेचन नहीं होता है वरन् कुरान व हदीस में जो लिखा है वह स्वयं नैतिकता का सबसे बड़ा प्रमाण है । जड़वादी मुल्लाओ के अनुसार कुरान व हदीस मे लिखी हर बात सत्य है । हो सकता है कि हिन्दुओं के ग्रंथों में भी स्त्री के लिए यही सब कुछ लिखा हो पर विषय यह है कि क्या हिन्दू अपने धर्म ग्रंथों पर आंख बंद कर विश्वास करते हंत । हिन्दू अपने धर्म ग्रंथ की किसी भी बात को अपनी बुद्धि पर कस कर ही उस को मानते हैं यही कारण है भारत मंं स्त्री की दशा को उन्नत करने के लिए कई कानून संसद द्वारा बनाए जा चुके हैं । परन्तु इस्लाम में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है । मुसलमानों कहते हैं कि कुरान व हदीस में किसी भी संशोधन की कोई जरूरत नहीं है । इस्लाम का एक मात्र ध्येय सारी दुनिया को मुसलमान बनाना है । इसीलिये इस्लाम द्वारा हिन्दु महिलाओ के लिये लविग जेहाद चलाया जा रहा है। कोई भी हिन्दू लड़की मुस्लिम बनने से पहले इस लेख को अवश्य पढ़ें



सामान्य व्यक्ति भी यह अंदाजा लगा सकता है कि यदि गर्भ निरोधक को हराम बताया जाता है तो स्त्री की दशा तो बच्चे पैदा करने की मशीन की तरह ही होगी । यदि यह माना जाए कि स्त्री 15 वर्ष की आयु से बच्चे पैदा करना प्रारम्भ करती है व 50 वर्ष की आयु तक बच्चे देती है प्रति दो वर्ष में एक बच्चे की दर से वह 17 बच्चे देगी ।
स्त्रियों का यह मजहबी कर्तव्य है कि वे अधिकाधिक संख्या में बच्चे पैदा करें,( इब्न ऐ माजाह खण्ड 1 पृष्ठ 518 और 523 ) । अपने ‘‘ सुनुन ’’ में यह उल्लेख है पैगम्बर ने कहा थाः ‘‘ शादी करना मेरा मौलिक सिद्धान्त है । जो कोई मेरे आदर्ष का अनुसरण नहीं करता, वह मेरा अनुयायी नहीं है । शादियाँ करो ताकि मेरे नेतृत्व में सर्वाधिक अनुयायी हो जांए फलस्वरूप मैं दूसरे समुदायों ( यहूदी और ईसाइयों ) से ऊपर अधिमान्यता प्राप्त करूं । इसी प्रकार मिस्कट खण्ड 3 में पृष्ठ 119 पर इसी प्रकार की एक हदीस हैः कयामत के दिन मेरे अनुयायियों की संख्या अन्य किसी भी संख्या से अधिक रहे । सूरा रूमें सूरा 3 आयत 30 - शारीरिक संरचना को मत बदलो । इतरा सूरा 17 आयत 21 अनाम सूरा 6 आयत 152 आप अपने बच्चों की हत्या मत कीजिए ।
ज़ाकिर नायक का इस विषय पर सत्यापन
दारुल उलूम का फ़तवा


‘‘ यदि स्त्रियाँ आपके आदेषो का पालन करें तो उन्हें उत्पीडि़त न करो ......................................... उनकी बात ध्यान से सुनो, उनका आप पर अधिकार है कि आप उनके भोजन तथा वस्त्रों का प्रबंध करो ’’( इब्न ऐ माजाह खण्ड 1 पृष्ठ 519 ) इस प्रकार स्त्री के अधिकार उसके भरण पोषण तक ही सीमित हैं बशर्ते कि वह अपने पुरुष की आज्ञाओं का पालन करे । इस्लाम का सामान्य विश्वास है कि पुरुष स्त्री की अपेक्षा श्रेष्ठ होता है । वास्तव मे कुरआन का कानून इस विचार की पूर्णतया पुष्टि करता है । स्पष्टीकरण प्रस्तुत है । ‘‘ ............................................. स्त्रियों में से जो तुम्हारे लिए जायज हो दो दो , तीन तीन , चार चार तक विवाह कर लो । ’’( 4 अननिसा 3 )



जड़वादी सोच का एक प्रमाण यह भी है कि " अल्लाह ने स्त्रियो पर पर्दे का कानून लागू किया है " अर्थात उन्हें सामाजिक जीवन में भाग नहीं लेना चाहिए ‘‘ और ईमान वाली स्त्रियों से कहा कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों ( गुप्त इंद्रियों ) की रक्षा करें और अपना श्रृंगार न दिखांए सिवाय उसके जो जाहिर रहे और अपने सीनों ( वक्ष स्थल ) पर अपनी ओढ़नियों के आंचल डाले रहें और वे अपने श्रृंगार किसी पर जाहिर न करें ................................ अनुवादक मुहम्मद फारूक खाँ, मकतबा अल हसनात ( देहली ) संस्करण ( अल अन नूर: 31 ) पुनः कुरआन में कहा है हे नबी ! अपनी पत्नियों और अपनी बेटियों और ईमान वाली स्त्रियों से कह दो कि वे ( बाहर निकलें तो ) अपने ऊपर चादरों के पल्लू लटका लिया करें । ( 33 अल अहजाब: 59 ) चादरों के पल्लू लटका लेने के साथ साथ , अल्लाह स्त्रियों के कार्यकलाप उनके घरों की चार दीवारों के भीतर ही सीमित कर देता है । ‘‘ अपने घरों के अंदर रहो । और भूतपूर्व अज्ञान काल की सज धज न दिखाती फिरो ’’ ( 33 अल अहजाब: 33 )
दारुल उलूम का फ़तवा
तस्लीमा नस्रीन का पर्दे पर सत्यापन



केवल पुरुष को तलाक का अधिकार
इस्लाम में केवल पुरूष को तलाक का अधिकार दिया गया है । महिला को इस विषय में कोई अधिकार नहीं है । इस्लाम में महिला को केवल भरण पोषण का अधिकार दिया गया है । यदि एक महिला के १० बच्चें हैं व पुरूष उसे किसी भी बात पर तलाक की धमकी देता है तो यह विचारणीय विषय है कि उस महिला की क्या हालत हो जाएगी । उसकी हालत उस बकरी की तरह होगी जिसके सामने कसाई सदैव छुरा लिए ‌खड़ा रहता हो ।
मजाक मे तलाक कहने से भी तलाक वैध
चैटिंग के दौरान



इसमें यदि पति किसी भी कारण से अपनी पत्नि को तलाक दे देता है व उसके बाद पुनः उससे शादी करना चाहता है तो उस स्त्री को पहले किसी अन्य मर्द से निकाह करके उसके साथ एक रात बितानी होगी उसके साथ हमबिस्तर होना होगा फिर दूसरा मर्द उसे तलाक देगा तब वह पहले मर्द के साथ दोबारा शादी कर सकती है । मुसलमान इस प्रथा को जारी रखने के लिये तर्क देते है कि यह इसीलिये बनाया गया है ताकि कोइ मर्द अपनी पत्नी को बिना बात के तलाक न दे । पर उस स्त्री के मन पर क्या बीतती होगी क्या किसी मर्द ने इस बात की भी कल्पना की है ।
दारुल उलूम का फ़तवा



जिस महिला का बलात्कार होता है वह पुलिस में जाती है तो आरोपी द्वारा उस पर यह आरोप लगाया जाता है कि उसे संभोग करने के लिए महिला द्वारा उकसाया गया है । उल्टे महिला पर इस्लाम के कानून की धार लटक जाती है । उल्लेखनीय है कि इसमें परिस्थितिजन्य साक्ष्य का कोई स्थान नहीं है । इस कानून के कारण मुस्लिम देशों में हजारो महिलाओं को हर साल जिना का आरोपी मानकर पत्थर मार मार कर हत्या कर दी जाती है ।
किसी महिला का बलात्कार होने की स्थिति में आरोपी को दण्ड तभी दिलाया जा सकता है जब
१-वह आरोपी स्वयं अपना अपराध मान ले
२- चार पुरूष गवाह मिलें ।
सामान्यतः ये दोनों ही बातें असम्भव है इसी कारण मुस्लिम देशों में महिला को ही जिना का आरोपी मानकर पत्थर मारकर मारने की सजा सुनाई गयी है । स्पष्ट है कि यह कानून मूर्खता का पराकाष्ठा है पर इस्लाम में किसी भी सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है । शरीयत के कानून को मुसलमान सर्वश्रेष्ठ मानते हैं ।
स्पष्टीकरन



सऊदी अरब की सरकारी वैबसाइट http://www.islamhouse.com/p/292386 के फतवे के पृष्ठ 26 पर स्पष्ट किया है कि पति को चार बातों के होने पर पत्नि की पिटाई का अधिकार है ।
पहला श्रृंगार को परित्याग करना जबकि वह श्रृंगर का इच्छुक हो।
दूसरा जब वह बिस्तर पर बुलाये और वह पवित्र होने के बावजूद उस के पास न आये। ( अर्थात सेक्स करने मे स्त्री के मन का कोई महत्व नही है यदि किसी स्त्री का बाप मर जाता है व उसका मन नही है तब भी वह ना नही कर सकती ।) एक स्त्री अल्लाह के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर सकती जब तक उसने अपने पति के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया है, यदि वह स्त्री ऊँट पर सवारी कर रही हो और उसका पति इच्छा प्रकट करे तो उस स्त्री को मना नहीं करना चाहिए । ( इब्न ऐ माजाह खण्ड 1 अध्याय 592 पृष्ठ 520 ) पुनः यदि एक पुरुष का मन संभोग करने के लिए उत्सुक हो तो पत्नी को तत्काल प्रस्तुत हो जाना चाहिए भले ही वह उस समय सामुदायिक चूल्हे पर रोटी सेक रही हो । ( तिरमजी खण्ड 1, पृश्ठ 428 )
तीसरा नमाज़ छोड़ देना।
चौथा उस की अनुमति के बिना घर से बाहर निकलना। -शाफेईय्या और हनाबिला का कथन है कि : उस के लिए पति की अनुमति के बिना अपने बीमार बाप की तीमारदारी के लिए निकलना जाइज़ नहीं है, और उसे उस से रोकने का अधिकार है . . .; क्योंकि पति का आज्ञा पालन करना अनिवार्य है, अत: अनिवार्य चीज़ को किसी ऐसी चीज़ के कारण छोड़ देना जो वाजिब नहीं है, जाइज़ नहीं है।
इस्लामी साक्ष्य विधि में एक पुरूष की गवाही दो मुस्लिम औरतो के बराबर बतायी गयी है ।



पैगम्बर की एक प्रसिद्ध परंपरा भी है जो कि कातिब अल वकीदी से संबंधित है और जिसको मुल्ला लोग मुस्लिम भाई चारे की घोषणा के लिए गर्व से बताते हैं:
‘‘ मेरी दो पत्नियों की ओर देखो और इनमें से तुम्हें जो सर्वाधिक अच्छी लगे उसे चुन लो । ’’
इस भाई चारे का प्रदर्शन मदीने के एक मुसलमान ( अंसार ) ने एक प्रवासी मुसलमान से उस समय किया था । जब पैगम्बर ने अपने अनुयायियों समेत मक्का से भागकर मदीने में शरण ली थी । यह प्रस्ताव तुरंत स्वीकार कर लिया गया था और भेटकर्ता ने अपनी उस पत्नि को तलाक दे दिया था जिसको प्रस्ताव के स्वीकारकर्ता व्यक्ति ने चुना था ।



हांलाकि इस विषय मुस्लिम विद्वानों में एक राय नहीं है । अफ्रीका के मुस्लिम देशों में यह प्रथा है कि वहां लड़की का भी खतना किया जाता है । यह इस्लामी मूर्खता की एक और मिसाल है किसी भी बात का निर्धारण उसके वैग्यानिक रूप से उपयोगी होने अथवा न होने से नहीं किया जाता बल्कि हर बात के कुरान व हदीस के आदेशों का सहारा लेना पड़ता है । बताया जाता है कि लड़की खतना काफी कष्टकारी प्रक्रिया है । व इसके होने का कारण यह बताया जाता है कि चूकिं इस्लाम में एक पुरूष को चार पत्नियां रखने का अधिकार है इस कारण वह अपनी चारों पत्नियो को संतुष्ट नहीं कर सकता । महिला के खतना करने से उसे संभोग से मिलने वाले आंनद में कमी आ जाती है इस कारण वह अपने पति के प्रति ईमानदार बनी रहती है ।
स्पष्टीकरण
महिला खतने से होने वाले दुष्प्रभाव
महिला खतने से होने वाले दुष्प्रभाव



कोई स्त्री बिना मरहम ( एसा पुरूष जिससे इस्लाम के अनुसार विवाह नहीं किया जा सकता हो जैसे सगा भाई व पिता ) के घर से बाहर नहीं जा सकती ।
स्पष्टीकरण
सारांश यह है कि इस्लाम में स्त्री को केवल भोग की वस्तु माना गया है । उसे केवल भरण पोषण का अधिकार दिया गया है जैसा कि एक गुलाम को दिया जाता है । भारत के सभी जागरूक लोगों से अपील है कि भारत में रहने वाली इन दस करोड़ मुस्लिम महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए महिला आयोग व सरकार पर दबाव बनाएं ।
 
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