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योग का अर्थ -
 
 
योग के सम्बंध में नाना प्रकार की फैली हुई भ्रान्तियों के निवारणार्थ उसके वास्वविक स्वरूप को समझा देना अत्यावश्यक है । मोटे शब्दों में योग स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर जाना अर्थात बाहर से अन्तर्मुख होना है । चित्त की वृत्तियों द्वारा हम स्थूलता की ओर जाते हैं अर्थात बर्हिमुख होते है । आत्मतत्त्व से प्रकाशित चित्त अहंकाररूप वृत्ति द्वारा , अहंकार इन्द्रियों और तन्मात्राओं रूप वृत्तियों द्वारा, तन्मात्राएं सूक्ष्म और स्थूल भूत और इन्द्रियां विषयों की वृत्तियों द्वारा बहिर्मुख हो रही है । जितनी वृत्तियां बहिर्मुख होती चली जाएंगी उनमें रज और तम की मात्रा बढ़ती ही जाएगी और उससे उल्टा जितनी वृत्तियां अन्तर्मुख होती जाएंगी उतना ही रज और तम के तिरोभावपूर्वक सत्त्व का प्रकाश बढ़ता जाएगा । जब कोई भी वृत्ति शेष नहीं रहेगी तब शुद्ध परमात्मस्वरूप शेष रह जाता है ।

ज्ञानयोग-

भौतिक पदार्थों का जान लेना अर्थात सांसारिक और विज्ञान का जानना ज्ञानयोग नहीं है । बल्कि तीनों गुणों और उनसे बने हुए सारे पदार्थो से परे अर्थात स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर तथा स्थूल, सूक्ष्म और कारण जगत अथवा अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय कोष अथवा शरीर, इन्द्रियों, मन अहंकार और चित्त से परे गुणातीत शुद्ध परमात्मतत्त्व को जिसके द्वारा इन सबमें ज्ञान, नियम और व्यवस्थापूर्वक क्रिया हो रही है, संशय, विपर्ययरहित पूर्णरूप से जान लेना ज्ञानयोग है । यह ज्ञानयोग केवल पुस्तकों को पढ़ लेने से या शब्दों द्वारा सुन लेने मात्र से ही नही प्राप्त होता है । उसके लिए उपासनायोग की आवश्यकता होती है ।

उपासना योग -

एक प्रत्यय का प्रवाह करना अर्थात चित्त की वृत्तियों को सब ओर से हटाकर केवल एक लक्ष्य पर ठहराने का नाम उपासना है । किसी सांसारिक विषय की प्राप्ति के लिए इस प्रकार एक प्रत्यय का प्रवाह करना उपासना कहा जाता है उपासना योग नहीं । यह उपासनायोग तभी कहलाएगा जब इसका मुख्य लक्ष्य केवल शुद्ध परमात्मतत्त्व की प्राप्ति हो । इसको स्पष्ट शब्दों में यो समझना चाहिए कि जिस प्रकार जल के सर्वत्र भूमि में व्यापक रहते हुए भी उसकी शुद्ध धारा को किसी स्थान विशेष से खोदने पर निकाला जा सकता है उसी प्रकार परमात्वतत्त्व के सर्वत्र व्यापक रहते हुए भी उसके शुद्ध रूप का साक्षात्कारकिसी स्थानाविशेष द्वारा अन्तर्मुख होकर प्राप्त किया जा सकता है । यह जो चित्त को किसी विशेष ध्येय ( विषय लक्ष्य ) पर ठहराकर शुद्ध परमात्मस्वरूप को प्राप्त करने का यत्न कियाजाता है यही उपासना योग है । इस एकाग्रतारूप उपासना को सम्प्रज्ञात समाधि तथा सम्प्रज्ञात योग कहते है । इसके पश्चात जो सर्ववृत्तियों के निरोध होने पर शुद्ध परमात्मस्वरूप में अवस्थिति है, वह ज्ञानयोग है । इसी को असम्प्रज्ञात समाधि तथा असम्प्रज्ञातयोग कहते हैं । इसके लिए किसी एकान्त निर्विन शुद्ध स्थान में सिर, गर्दन और कमर को सीधा रखते हुए किसी स्थिर सुख आसन में बैठना, प्राणों की गति को धीमा करना और इन्द्रियों को बाहर के विषय से हटाकर चित्त के साथ अन्तर्मुख करना आवश्यक है । फिर ये देखना होगा कि अन्तर्मुख होने के लिए किस स्थान को लक्ष्य बनाया जाए । वैसे तो परमात्मा सर्वव्यापक है, किंतु उनके शुद्ध स्वरूप तक पहुंचने के लिए अपने ही शरीर में किसी स्थान को लक्ष्य बनाने में सुगमता रहती है । इसमें पांच विषयवर्ती प्रवृत्ति के स्थान हैं । अर्थात नासिका का अग्र भाग गंध का , जिव्हा का अग्र भाग रस का , तालू रूप का , जिव्हा का मध्य भाग स्पर्श का और जिव्हा का मूल भाग शब्द का स्थान है । इनसे भी अधिक प्रभावशाली विशों का ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के सुषुम्ना नाड़ी में विद्यमान मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रारचक्र हैं । सुषुम्ना, जो गुदा के निकट से मेरुदण्ड के भीतर होती हुई मस्तिष्क के ऊपर तक चली गयी है, सर्वश्रेष्ठ नाड़ी है । यह सत्त्वप्रधान, प्रकाशमय और अद्भुत शक्ति वाली है ।यही सूक्ष्म शरीर, सूक्ष्म प्राणों तथा अन्य सब शक्तियों का स्थान है । इसमें बहुत से सूक्ष्म शक्तियों के केन्द्र हैं जिनसें अन्य सूक्ष्म नाड़ियां मिलती हैं । इन शक्तियों के केन्द्रों को पद्म, कमल तथा चक्र कहते हैं । उनमें उपर्युक्त सात मुख्य हैं । उनमें भी मणिपूरक, अनाहत, आज्ञा और सहस्रार विशेष महत्व के हैं । किसके लिए ध्यान के वास्ते कौन सा स्थान अधिक उपयोगी हो सकता है यह इस मार्ग के अनुभवी ही बता सकते हैं ।
जिस प्रकार तली तोड़ कुएं के खोदते समय कई प्रकार की तहें तथा अन्य अद्भुत वस्तुएं निकलती हैं ऐसा ही ध्यान की अवस्था में भी होता है । यहां भी स्थूलभूत, सूक्ष्मभूत, अहंकार और अस्मिता ( आत्मा से प्रकाशित चित्त ) ये चार प्रकार के की तीन गुणों की तह आती है । जब स्थूलभूत अथवा उनसे सम्बंध रखने वाले विषय सामने आवें उसको वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि, जब सूक्ष्मभूत अथवा उनसे सम्बंधित विषय उपस्थित हों उसको विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि, जब इन दोनों विषयों से परे केवल अहमस्मि वृत्ति रह जाए उसको आनन्दानुगत और जब उससे भी परे केवल अस्मि वृत्ति रह जाए उसको अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं ।
जिस प्रकार सारी मिट्टी की तहों के समाप्त होने पर जल को रेत से अलग किया जाता है, इसी प्रकार गुणों की इन चारों तहों के पश्चात जब आत्मा को चित्त से अलग साक्षात कियाजाता है तब उसको विवेकख्याति कहते हैं । उसके पश्चात शुद्ध परमात्मस्वरूप शेष रह जाता है जो समाधि, असम्प्रज्ञात योग या ज्ञानयोग कहलाता है । अतः उपासना योग द्वारा ही ज्ञानयोग की प्राप्ति हो सकती है । परंतु यह उपासनायोग भी कर्मयोग के बिना नही साधा जा सकता ।

कर्मयोग -

कोल्हू के बैल की तरह कामों मे लगे रहने का नाम ही कर्मयोग नहीं है ।शरीर, इन्द्रियों, धन सम्पत्ति आदि सारे साधनों, उनसे होने वाले कर्तव्यरूप सारे कर्मो को तथाउनके फलों को भी ईश्वर को समर्पण करते हुए अनासक्त निष्काम भाव से व्यवहार करने का नाम कर्मयोग है । जिस प्रकार मंच पर आया हुआ एक्टर अपने पार्ट का भलीभांति जानता हुआ अंदर इसका कोई भी प्रभाव अपने दिल पर नहीं होने देता उसी प्रकार कर्मयोगी ईश्वर की ओर से आए हुए सारे कर्तव्यों को भलीभांति करता हुआ भी अंदर से अलिप्त रहता है ।
कर्मों को ईश्वर के समर्पण करके और आसक्ति को छोड़कर जो कर्म करता है वह पानी में पद्मपत्र के समान पाप से लिप्त नहीं होता । योगी फल की कामना और कर्तापन के अभिमान को त्यागकर अन्तःकरण की शुद्धि के लिए केवल शरीर, इन्द्रियों मन और बुद्धि से काम करते है। योगी कर्म के फल को छोड़कर परमात्मप्राप्तिरूप को शांति को लाभ करते हैं । अयोगी कामना के आधीन होकर फल में आसक्त हुआ बंधता है ।
उपासना में जब चित्त की वृत्तियों को एक लक्ष्य विशेष पर ठहराने का यत्न किया जाता है तो तब मन अन्य विषयों में राग होने के कारण उनकी ओर दौड़तायें में राग सकाम कर्मों से होता है । इसलिए विषयों से वैराग्य प्राप्त करने के लिए कर्मों में निष्कामता होना आवश्यक है । अर्थात पापरूप अधर्म कर्म तो त्याज्य होते ही हैं । पुण्यरूप धर्म अर्थात कर्तव्य कर्मो को भी उनकी फलों की इच्छा को छोड़कर निष्कामभाव से करना चाहिए । इसलिए उपासना योग बिना कर्मयोग की सहायता के सिद्ध नहीं हो सकता । किंतु ये निष्कामता के भाव भी ध्यान द्वारा ही परिपक्व हो सकते हैं । अर्थात कर्मयोग की सिद्धि भी उपासनायोग की सहायता से ही हो सकती है । इसलिए जिस प्रकार संसार की कोई भी वस्तु सत्त्व, रजस और तमस के सम्मिश्रण के बिना अपना अस्तित्त्व नहीं रख सकती, केवल इतना भेद होता है कि कही सत्त्व की प्रधानता होती है, कही रज की और कहीं तम की । इसकी प्रकार इन तीनों योगों में भी तमरूप उपासनायोग चित्त को एक लक्ष्य पर ठहराने वाला , रजरूप निष्काम कर्मयोग ओर सत्वरूप ज्ञानयोग ये तीनों किसी ना किसी अंश में बने ही रहते हैं । यह अवश्य होता है कि कहीं उपासना की प्रधानता होती है कहीं कर्म की तो कहीं ज्ञान की ।
पातंजली योग प्रदीप से साभार
 
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